रविवार, 23 दिसंबर 2012

स्त्री के प्रति

जब मर्द ने आँखे खोली
तब पहला चेहरा देखा माँ का
वो भी एक स्त्री है

जब तक सलामत रहा
तब वो बहन की राखी थी
वो भी एक स्त्री है

जब सौन्दर्य एवं सुकून में जीया
तब वो प्रेमिका थी
वो भी एक स्त्री है

जब लडखडाए कदम ज़िन्दगी में
संवारी ज़िन्दगी पत्नी ने
अपनी पूरी ज़द्दोज़हद से
वो भी एक स्त्री है

जब थके कदमो से कभी
घर की चौखट पे लौटा
तब दरवाजे पर करती इंतज़ार बेटी
थामे गिलास में पानी और गुड
वो भी एक स्त्री है

आँखे खोलने से बंद होने तक
जिसने साथ निभाया
जिसने तुम्हे जंतु से इंसान बनाया
वो भी एक स्त्री है

फिर सवाल एक उठता है कि
जिसे तुमने चौराहे पर छेड़ा
जिसे तुमने चंद कौड़ी के लिए
गैस के चूल्हे में भून दिया
जिससे शराब के नशे में
भद्दी भद्दी गालियाँ दी और
लात-घूंसों से नवाजा
जिसे तुमने जब चाहे तब
बना लिया अपनी हैवानियत भरी
हवस का शिकार
सिर्फ एक मिलीमीटर चमड़ी की खातिर .
वो क्या कोई नहीं है तुम्हारी
जवाब अगर न दे सको तो
निकाल कर फेंक दो उन आँखों को
काट कर अलग कर दो उन हांथो को
कुचलकर शिश्न को बन जाओ नामर्द
और दुआ करो खुद अपने लिए कि
जीने का तुम्हे अब कोई हक नहीं
क्योंकि
वो भी एक स्त्री है .

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