बुधवार, 5 सितंबर 2012

चार दृश्य

१:-
सहसा उन्नीदी टूटी मेरी
लगा जैसे जागा हूँ वर्षो बाद
सुबह ही देखा था अखबार
और कोकराझार का दृश्य 
छोटे-छोटे बच्चे और कोटरे से
निकली उनकी आँखें ,जो
नीले पड़ गए उनके बद्बदाये
तन को देख रहे थे पत्थर सा
और टेलेविज़न का वो एड 
आ गया याद , जिसमे एक महिला
कहती है : " देश उबल रहा है "....
२:-
देश उबल रहा है ,पर
प्रश्न यह उठता है कब तक
चौरासी के दंगे में ,भी
उबला था और भोपाल
से लेकर मेरठ दंगो में
उबला था ,बयानबे तक
आते-आते तो पूरा देश
बहता रहा उबल-उबलकर
इससे भी हुआ न खत्म 
तो गोधरा व मऊ ने
बदल दिया देश का रंग.....
३:-
आज उबलने और जलने में
फर्क नहीं क्योंकि 
इंसान के घरो में अब
शाम की रोटी पकने से
चिमनी से धुआ नहीं निकलता
बल्कि उनके मवेशियों और
बच्चो के घरो में जिंदा
जलने से उठता है
धुआ काला ......
जिसके कालेपन में छिप
जाता है चेहरा हैवानियत का  .......
४:-
देश की सत्ता और
संसद के गलियारों में
बैठे खद्दर खादी वाले
जो बेचते है चांदनी ख्वाब
और केसरिया रंग,करते है
अपनी-अपनी राजनीति 
जिनकी नज़र में अपना देश
इक्कीसवीं सदी का राजा होगा
जिसमे सर कटी लाश वाले नर
और पेट फाड़ कर गर्भाशय
हाँथ में पकड़ी हुई मादा होगी
और जहाँ साँझ को
किसी बच्चे के लिए
माँ की फूली हुई रोटिया नहीं
बल्कि उसकी माँ-बहन का
गर्मागर्म ग़ोश्त परोसा जायेगा ////

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें