भिन-भिन-भिन-भिन
भिन-भिन-भिन-भिन........
इक संगीत ////
गूंज रहा था अचेतन में
इक अजीब सी दुर्गन्ध
रही थी फ़ैल
दूर से दिख पड़ा कुछ
लाल और काले कपडे का चिथड़ा
सुबह भी पहला रंग
यही देखा था मैंने, पर
उसे सुबह देखा था अकेले
और अभी देख रहा हू
कईयों के बीच में
बाढ़ में घर था डूबा
तो लाल टिके के चक्कर में
आया था गुलाबी शहर
जीना सीख ही रहा था
रोज़ तिपहियो के चक्कों
सा घिस कर
कमाता भी ठीक था, पर
इतना घिसता था कि
उस चिथड़े कि तरह
हरा बचाता लाल बचाता
और बनता लाल को
हरा और हरे को .........
और इसी हरे-लाल
मिलावट के दौर में
काली थी ली पी, और
कै पे कै भी हुई
उडी भी दुर्गंधिया
फिर भी लाल-हरा का अंतर
पहचान न पाया, शायद
उसको रंगों कि जात
थी नहीं सुझाती
इसीलिए तो आज कुछ
खाकी वर्दी और पंचनामे का कागज
साथ में बहुत सारी दुर्गंधिया
और भिन-भिन-भिन.....
भिन-भिन-भिन.......
का संगीत////
जो कह रहे थे कि कल
रात थी पी ली
शराब ज़हरीली
जो उसके हरे-लाल को
मिला दिया और
बना दिया एक रंग
काला ..............
,,,,,,,,,,,,,,,,,पक्का ///////
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