गुरुवार, 21 नवंबर 2013

दीमक

इस अंधियारे में चुप्पी से
चाट रहे है कई दीमक
मेरे स्वप्न-घर के किवाड़ 
और तुम खड़े हो सामने मेरे
खोखल में पड़े लिजलिजे
दसियों दांतो वाले मासूम कीड़े से
जो निरंतर मद्धम मेहनतकश है
मेरी आँखों की चमक को
धुंधला करने के लिए,
जिससे मेरा लाख का महल
पाये न जलने अपितु
गिर जाये भुरभुराकर और
हज़ारों छिद्रों से घुंस सके
सिहरती सर्द हवाएं
जमा देने के लिए लाल ग्लेशियर
कभी देखा है उसे
जो चीरता रहता है निपट एकांत को भी
इस अंधियारे में
प्रकट होते है बहुत से चेहरे, दृश्य-चित्र
मेमने के पीछे भागता भेड़िया
भेड़िये के पीछे भागता नरभक्षी
नरभक्षी के पीछे भागता नर
नर के पीछे भागता नर
और अंत में एक अदृश्य तट
जिसपर कुछ निरंतर भ्रम है बना 
मानो कहीं भीतर ही भीतर
मिल रही हो चेतावनी
किर्र- किर्र- किर्र -किर्र.......////

सोमवार, 18 नवंबर 2013

रेखाएं बदलती हैं

रेखाएं बदलती हैं
मुझे नहीं लगता
वरना खादी पहनने वाले
किसी फ़िल्म के अभिनेता न बन जाते ?
खैर नेता न बन पाने से
कोई जनता भी नहीं बन जाता
बस कल ही कचहरी वाला तोता
निकाल बैठा
मेरा बेटा ज़मींदार होगा
मैंने कहा ज़मींदारी कैसे मिलेगी ?
तो फटाक से निकाल दी खानदानी पर्ची
जिसमे लिखा था गड़े खजाने का रहस्य
सतपुड़ा के जंगल !!
अरे! मेरा बेटा जंगली होगा ?
रेखाएं कैसे बदलती है !
छुटपन में हस्तशास्त्र  में पढ़ा था
शनि राहु पाहुन बन के आयेंगे
और स्त्रियों को शगुन में ले जायेंगे 
तब ही मैं सोचता हूँ कि अब चाँद
दिखता क्यों नहीं या बड़े शहरों में
चार इंच की दिवार बहुत ऊँची हो गई है ,
अब बचा ही क्या जो मैं जानता
कि रेखाएं बदलती है
क्योंकि रुपया हाँथ का मैल होता है
हद्द हो गई अब कहाँ है कोई शुद्ध 
सब तो ज्यादा से ज्यादा 
उठाना चाहते है मैला, कामना चाहते है
बचाना चाहते है, उड़ाना चाहते है
आज कल तो गुप्तचरों ने रात के अँधेरे में
कईयों को सोते देखा है मैले पर
अरे अब तो सोना भी मुहाल है
पता नहीं कब मैले वाले की
बड़की चारपहिया कचक जाये
और हमें भेज दे ब्लैकबक योनि में
पता नहीं धोती वाले ने क्या सोचा था
कि घर को मैला मुक्त बनाएंगे !
रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार
और सुबह होने न दे
ढाई आखर का प्रेम डेढ़ ही रहने दो
क्योंकि ज़िन्दगी के साथ का तो क्या 
बाद में सेकंड इनिंग होम का ही सहारा है
अरे सहारा से भी रेखाएं बदलती हैं
साईकिल चलाते-चलाते देखो जहाज़ चलाने लग जाता है
वैसे अब रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
वरना दो अर्थों के भय से मुझे क्या
मुझे तो द्विअर्थी में ही मज़ा आता है
कहीं सुना था कि
जो मज़ा खाज में है वो मज़ा राग में कहाँ  ///