बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

ख़त

बहुत दिनों से 
तलाश रहा था वो ख़त , 
जो तुमने लिखा था 
जिसमे तुमने बताई थी 
बहुत सी बातें 
कि कब तुमने खरीदी थी 
मोगरे वाली धूप 
कब तुमने की थी 
चाँद से शिकायत 
कब तुमने काट ली थी 
उंगलियाँ बेख्याली में , 
और कब तुमने शकुंतला पढ़ते हुए 
भिगो दिया था सिरहाने को
और हाँ ...वो भी जिसमे 
तुमने मुंह फुला के लिखा था 
कि तुम कुछ नहीं लिखते .../

खोजते-खोजते 
उस धूप की महक
उस गप्पी चाँद
और वो बेरहम धार 
जो साल रहा था अन्दर-अंदर
स्मृतियों को कहीं हल्के से निर्मम
सबसे मिल आया, पर
अभी बाकी है एक जगह 
वही सिरहाना, जहाँ तुमने 
बचा के छोड़ रखी है
ज़िन्दगी की नमी ..../////   वित्रि

                         
  
  

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नौ बच्चों वाली

हजारों कदमों के बीच
उड़ती धूल और गन्दगी के बीच
लपलपाती है लाखों मक्खियों की ऒर
जैसे मानो उनसे कर रही हो
छिना-झपटी या मनमनुहार
कि मैं भी हूँ ईश्वर की निर्मिति
या समझो तो डार्विन के विकास की नियति
इस बीच वो ताड़ के दो बार
आ चुकी है गली के कोने में पड़ी
कार के नीचे,
जहाँ नौ जोड़ी आँखें
टकटकी लगाये सकपकाई सी
आते जाते कदमों की ताल और
टायरों की रगड़ के बीच कर रही होती
इंतज़ार .......
तभी चौधरी दूध की थैली
लेकर निकलता है रोज़ की तरह
काले रंग की खोज में और
रह जाती है फिर से वो
अभागी या शास्त्रों के भाग से अछूती
थक हार कर अपने खून का ही रंग
कर देती सफ़ेद जिससे
वो निभा सके अपना धर्म
साथ ही पा ले तमाम धर्मों से मुक्ति और
अपने नौ नवजात बच्चों की आँखों की चमक
और अपनी एक आँख में संतोष तो
दूसरी आँख में अगली लड़ाई की चित्रावली ../////   वित्रि