बुधवार, 30 जनवरी 2013

प्री-पोस्ट

भटकती केन्द्रीयता के बीच
विखंडित वर्जनाएं और
लिजलिजेपन की दुर्गंधियाँ
अन्स्थल में भटकती आवाजें
कंदराओं से आती मुक्ति वीणा
सौन्दर्य में भीगी बालाएं
और भिन-भिनाते मुद्रा के खुले मुख
सपाट दूर विद्रोहों से होकर
निकला समुद्र का ज्वार
और अभिशप्त  प्रेतों की आत्मा
यौनिकता के रूढ़ प्रतिमान
जिसमे परोसा अद्धुनातन विचार
क्षणिक सरोकार में परिभाषित
ललायित नए सन्दर्भ गढ़ने  को
पिछले दरवाजे की खड़-खड़ और
आता ध्वजों पर भर के ग्लोब
दबे पाँव सरकते-सरकते आकर
जाता है मिल परछाई में
लुप्त होकर मानो अनुनाद
दिग्भ्रमित केंद्र और परिधि
शंका उठती जिसमे स्थानीयता
केंद्र की उठती भीषण लपटें
चला जा रहा उसी पथ पर
पंथवरों की तरह सर झुकाएं.....
शक्तिपुंज में खड़ा हाँथ जिसमे
व्यक्ति, संशय, अनास्था, मूल्यहीनता,
व्यवस्था विरोध, अतीतविमुखता
बुद्धिवाद में एनलाइटेंमेंट प्रोजेक्ट
देवता है मानव निर्मित
पृष्ट में जो है खड़ा
बिम्ब, प्रतीक, अन्तश्चेतना,
भविष्य और क्षय  से पूरित
रेंगता, निख्ड़ता इसलिए अब स्वायत
गुणसूत्रों में तैरता मृत्युगीत
लेखक, कला, विचार, इतिहास
करते बारी-बारी अपने पिंडदान
मात्र संरक्षित ध्वनि शब्द
आते पल-प्रतिपल निकट और निकट
बढ़ता हुआ हाहाकार स्तब्ध
अनिश्चित , चीज़ों का बाज़ार
दिखती परछाई भी विशाल
और छोटा दिखता प्रेत
ग्लोबल मैन, तीन मकारों की दुनिया
नसों में होता पॉवर शिफ्ट
मर्द वियाग्रा और नारी कंडोम थामे
यूटोपिया से डिसटोपिया (एंटी-यूटोपिया)
ब्लैक लिटरेचर से ब्लैक वीमेन टॉक
 डेथ ऑफ़ मनी से मास कल्चर
आइडियोलॉजी में ग्लोबल मैन
अकड़ रहा है खाकर चमत्कारी मैगी
रेस में सुपर टेक्नोलॉजी
पोस्ट स्मोकटेक सिविलाइज़ेशन
देह और प्रेत को बना प्रोसुमर
देह सिखाता श्रम और
देता सेवा प्रेत को
बनाकर परछाई विराट वीभत्स
सारे रेवोलुशन हैं ख़त्म
मॉडर्न बौद्धिक की बनाई परछाई
देखता रेटिना की नसों को तानकर प्रेत
हो गया लेज़ का चिप्स
खाकर देह जीरो फैट
मल्टी विटामिन-मिनिरल टेबलेट
बंद है विखंडन की शीशी में
जिसमे देह और प्रेत
उड़ सकते है उड़नतश्तरी में
बिना कुंडली जागरण के
क्योंकि भटकती केन्द्रीयता के बीच
विराट वीभत्स परछाई ने
धरती को सेंटर ऑफ़ मास चिन्हित किया है ////
 

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

कोल्ड नाइट

यूँ ही जागा रहा रात भर
बेचैन काली रात पूस में
ठण्ड से भी ठंडी रात
सडको पर सिर्फ दिखते है मटियाले
बनकर मेरे गिरेबान का कॉलर
बचाते मुझे सर्पतों की सुख्हंडों से
करके मुझे अकेला बिलकुल
क्योंकि उन्होंने कर दी घोषणा
अब तुम बहोगे १४४ धारा में
वर्ना पूर्णिमा के दरिन्दे तुम्हारे
गरमा- गर्म गोश्त को निकाल
लेंगे तुम्हारे कॉलर से
चिल्लाना तो बिलकुल भी न 
नहीं तो सेंक लेगे बार के कौड़ा
खड़ी धूप के कोहरे में गाँधी टोपीवाले नागरिक
और रंग बिरंगे प्रचारों के
साथ ही , तुम जाओगे बन 
टी आर पी के वन नाइट स्टार
और घर पर बैठे तिरोहित जन
गर्म चाय-पकोड़ों के साथ
तुम्हारी गंधैली ज़िन्दगी की
बदबू पर , करके इन्द्रिय बंद
जायेंगें बन गाँधी जी के बन्दर
जिनके होने का एहसास होता है
उनके सीने के फूलने पचकने से मात्र ...
पर तुम डरना नहीं क्योंकि
तुम्हारे लोथड़ों और खून
का डी एन ए आयोगों और समितियों
की स्याही में नीला दिखेगा ,और
गणतंत्र में तुम बन जाओगे काले
तुम्हारी स्निग्धता और स्वतंत्र
होने की इच्छा अब भी काली है
क्योंकि तुम्हारे देश का कानून
आज भी चलता है औपनिवेशिक 
दासता के ढर्रे वाली धर्मावली पर
और तुम्हारी भयानक आत्मा को
मिल न सकेगी मुक्ति न्यायाधिकरण में भी
चाहे करो कितने भी पिंड दान .........
जानते हो क्यूँ ....क्योकि मोक्ष के लिए भी
सब ठीक होना जरुरी है
और ठीक होने के लिए
तुम इतना तो ख़याल रखो कि
जब इस गणतंत्र में आँखे खोलो
तो तुम जन्मांध बन जाओ 
बना लो अपने दिल-फेफड़े को साउंड प्रूफ
और कानो में कुछ भी भुरभुराए तो
कान में डाल लो पिघला हुआ सीसा
और चेतन का सी टी स्कैन करके
बना दो रिपोर्ट कि तुम कोमा में हो ......
क्योंकि यूँ ही जागता रहा रात भर ............./////////////////