रविवार, 23 दिसंबर 2012

स्त्री के प्रति

जब मर्द ने आँखे खोली
तब पहला चेहरा देखा माँ का
वो भी एक स्त्री है

जब तक सलामत रहा
तब वो बहन की राखी थी
वो भी एक स्त्री है

जब सौन्दर्य एवं सुकून में जीया
तब वो प्रेमिका थी
वो भी एक स्त्री है

जब लडखडाए कदम ज़िन्दगी में
संवारी ज़िन्दगी पत्नी ने
अपनी पूरी ज़द्दोज़हद से
वो भी एक स्त्री है

जब थके कदमो से कभी
घर की चौखट पे लौटा
तब दरवाजे पर करती इंतज़ार बेटी
थामे गिलास में पानी और गुड
वो भी एक स्त्री है

आँखे खोलने से बंद होने तक
जिसने साथ निभाया
जिसने तुम्हे जंतु से इंसान बनाया
वो भी एक स्त्री है

फिर सवाल एक उठता है कि
जिसे तुमने चौराहे पर छेड़ा
जिसे तुमने चंद कौड़ी के लिए
गैस के चूल्हे में भून दिया
जिससे शराब के नशे में
भद्दी भद्दी गालियाँ दी और
लात-घूंसों से नवाजा
जिसे तुमने जब चाहे तब
बना लिया अपनी हैवानियत भरी
हवस का शिकार
सिर्फ एक मिलीमीटर चमड़ी की खातिर .
वो क्या कोई नहीं है तुम्हारी
जवाब अगर न दे सको तो
निकाल कर फेंक दो उन आँखों को
काट कर अलग कर दो उन हांथो को
कुचलकर शिश्न को बन जाओ नामर्द
और दुआ करो खुद अपने लिए कि
जीने का तुम्हे अब कोई हक नहीं
क्योंकि
वो भी एक स्त्री है .

बुधवार, 5 सितंबर 2012

चार दृश्य

१:-
सहसा उन्नीदी टूटी मेरी
लगा जैसे जागा हूँ वर्षो बाद
सुबह ही देखा था अखबार
और कोकराझार का दृश्य 
छोटे-छोटे बच्चे और कोटरे से
निकली उनकी आँखें ,जो
नीले पड़ गए उनके बद्बदाये
तन को देख रहे थे पत्थर सा
और टेलेविज़न का वो एड 
आ गया याद , जिसमे एक महिला
कहती है : " देश उबल रहा है "....
२:-
देश उबल रहा है ,पर
प्रश्न यह उठता है कब तक
चौरासी के दंगे में ,भी
उबला था और भोपाल
से लेकर मेरठ दंगो में
उबला था ,बयानबे तक
आते-आते तो पूरा देश
बहता रहा उबल-उबलकर
इससे भी हुआ न खत्म 
तो गोधरा व मऊ ने
बदल दिया देश का रंग.....
३:-
आज उबलने और जलने में
फर्क नहीं क्योंकि 
इंसान के घरो में अब
शाम की रोटी पकने से
चिमनी से धुआ नहीं निकलता
बल्कि उनके मवेशियों और
बच्चो के घरो में जिंदा
जलने से उठता है
धुआ काला ......
जिसके कालेपन में छिप
जाता है चेहरा हैवानियत का  .......
४:-
देश की सत्ता और
संसद के गलियारों में
बैठे खद्दर खादी वाले
जो बेचते है चांदनी ख्वाब
और केसरिया रंग,करते है
अपनी-अपनी राजनीति 
जिनकी नज़र में अपना देश
इक्कीसवीं सदी का राजा होगा
जिसमे सर कटी लाश वाले नर
और पेट फाड़ कर गर्भाशय
हाँथ में पकड़ी हुई मादा होगी
और जहाँ साँझ को
किसी बच्चे के लिए
माँ की फूली हुई रोटिया नहीं
बल्कि उसकी माँ-बहन का
गर्मागर्म ग़ोश्त परोसा जायेगा ////

रविवार, 26 अगस्त 2012

मनुष्य का प्रमाण-पत्र

जीवन की सार्थकता के
अर्थ दो हो जाते है आज,
और उनका अर्थ भी
दो शब्दों के साथ ही
जाता है बदल ,
जैसे सफलता और असफलता
क्योंकि आज मनुष्य का
निराकार स्वरुप
नहीं है स्वीकार्य ,
वह समाज को
चाहता है प्रदान करना
आकार ,
जिसमे वह व्यक्ति
व्यक्ति के समूह को
अपने अनुरूप कर सके
प्रमाणित .../////

बाहर-अंदर

मानव , मानव से क्या
चाहता ? सिर्फ कुछ साथ
या कहू ,
कुछ और
प्रेम का औदात्य
या नफरत की
ऐसा क्यूँ ?
लोग धर्म को
जोड़ते है मानव अस्तित्व से
एक धर्म और एक धर्म
या कुछ और
या एक विरोध
नज़र क्यों नहीं आता 
लोगों को
दो नदियों की धारा
जो मिलती है
एक ही गंतव्य को
पर प्रवित्ति तो
झलकती है साफ़
वही नदी  , वही मानव
वही धारा , वही जीवन
वही गंतव्य और वही गंतव्य
पर दिखता नहीं , उन्हें 
दोनों के अन्दर का
द्वन्द , जो बाह्य प्रकार्य को
छोड़ , अन्दर से मिल जाने को
है तत्पर, हो एक //////

इक डर

सपने देखना  मुश्किल नहीं
पर पूरा सच देखना
अपने हांथों में हो
ये मुश्किल होता , है न  !
कभी किसी ने सोचा , ये
कि साहिल भी कभी थकेगा
है न असमंजस !
रोज़ थकता हूँ मैं
सोचो किससे ?
एक मंदी सी हंसी
आप होंगे  हँसते , पर
शायद सच कहता मैं
अपने आप से
अपने मन से
अपने तन से
और सबसे ज्यादा
अपनी सोच के अधूरेपन से
सच कहता था न मैं
आखिर हंसी आ गई !!...

शनिवार, 25 अगस्त 2012

याद

आज भी याद आता
घुटनों के बल घूमना
तुम्हारा
सामानों का करीने से रखना
फिर थककर बैठ जाना
कुछ देर
फिर उठाना भड़ककर गुस्सा
होना तुम्हारा , मुझपर
और कहना मेरा नाम
अपनी तोतली जुबान से
आज भी याद आता
पैर पटक-पटक कर चलना
तुम्हारा
पल भर , में मचल जाना
कुछ पल हवाओं में नाचना
तुम्हारा
फिर हौले से अपनी बांहों
में ले , जो मुझे हर बात
से दूर ले जाती
आज भी याद आता है
सब कुछ ठीक होते हुए
गुस्सा हो तुम्हारा
सड़क पर गुस्से में
आगे चलना तुम्हारा 
फिर पीछे-पीछे मेरा आना
लड़ना कहीं भी सड़क पर
और कहना तुम्हारा
मैं अकेली चली जाउंगी
कितनी बार गई हूँ अकेले
तुम्हारी कोई जरुरत नहीं
आज भी याद आता
तुम्हारा अगली सुबह
दरवाजे पर दस्तक देना
और इक प्यारी सी
मुस्कान बिखेर देना
जो मेरी सोई हुई
आँखों में इक सुबह
की खिलखिलाती धूप
सी जाती फ़ैल
आज भी याद आता
हर ख़ुशी और हर गम
जो साथ-साथ बांटी
साथ तुम्हारे
आज भी याद आता
तुम्हारे बाँहों का कसाव
तुम्हारे होंठो की नमी
जो मुझे इस दुनिया से
दूर ले जाती है जहाँ
होती हो तुम और
याद आती तुम्हारे  बदन
की खुशबु , जो
जाने के बाद भी
मेरे तन में बसी रहती
आज भी याद आता
घंटो तुमसे बातें करना
और वक़्त का पता न चलना
ख्वाबो में डूबकर , पूरी
रात तन्हाई में गुजरना
आज भी याद आता है /
आगे भी याद आएगा
जब तुम चली जाओगी
मेरी ज़िन्दगी से दूर बहुत
और मेरा कोई निशान भी
रहेगा न तुम्हारे  इल्म में 
पर तुम न समझो , शायद
बेहतर होगा
क्योंकि तब भी याद
आओगी मुझे ,जैसे
आज भी याद आता
घुटनों के बल घूमना
तुम्हारा ....//////

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

केवल मैं और तुम

रुक कर पूँछा उनसे
एक साथ की बात
टाल जाते
जवाब का इंतज़ार
रहता , पर
शायद पता था जवाब
उनको भी और
मुझको,
परन्तु इतना ही सम्बन्ध
कि एक जवाब के
रुख पर
छोड़ दे ज़िन्दगी जीना
सपने देखना
या वो कसमे जो
ली थी तुमने या
मैंने /
सोचकर देखा तो
एक असमंजस......
एक घुमावदार चक्र
जिस पर केन्द्रित
नहीं हो पा रहा
आज मन
जानते है हम दोनों\
परिणिति को, पर
क्यों टूट जाते तुम
या मैं /
सोचकर देखा तो
यह समाज ही
यह धर्म ही
यह रिश्ते ही
जो हम बनाते
अपने आस-पास
कारक और कारण
पड़ते  है बन /
तुमसे जुड़ने से पहले
यह तो नहीं था
शायद , इन पर सोचा नहीं
पर अब टूटते वक़्त
इन पर क्यों सोचता
शायद मैं इस जुड़े
बंधन से डोर के
दोनों किनारों को भी
चाहता हूँ जोड़ना ,पर
शायद तुम कमज़ोर हो
या मैं /
एक किनारा तो जोड़ लिया
जो तुम्हारा और मेरा था , पर
मैं जानता हूँ कि
दूसरा हमारा नहीं
क्योंकि वही से
हमारी शुरुआत है
और वही हमें छोड़
देने का , अधिकारी है
न ही तुम या न ही
मैं /
तोडना तो पड़ता है
ये डोर एक दिन
सबको
पर तुम मजबूर हो
और मजबूर हूँ मैं
कि हम वादा निभा रहे
तोड़ नहीं सकते वादा
मैं और न ही तुम
तोडना चाहती हो /
क्या मेरे या हमारे
दरम्या इतना भी बल नहीं
कि तोड़ दोनों किनारे
जो जड़ से जुड़े हैं
बना ले एक घेरा
जिसकी परिधि में हो
केवल तुम और
मैं /////

नवयौवन का स्वप्न

मेरे स्वप्न क्या ?
जो हर उस चेतन में
जिसमे नवयौवन है
छेड़ जाता है
क्यों एक राग
जिसकी परिधि
प्रेम है या देह
या कुछ और,
कही पिता का दबाव
तो कभी समाज
जिसमे वो जिंदा है
जो इसे बांधते है
क्यों वो
तोड़कर ये घटिया तागे
स्वप्न देखता है ?
कारण, शायद
वे स्वप्न ही
जिंदा रखते है ,
कभी स्वयं के लिए
कभी अपनों के लिए
क्यों वो "अपनों" को
पूर्ण कर पता है
और स्वयं को सती........?
गीता सब को याद है
पर "स्वयं" ध्यान नहीं
अधिकार नहीं
स्वतंत्रता बिक गई है
दास और नवयौवन  में
अंतर क्या ?

दर्द भी ज्यादा
इस नव यौवन का
लोग कहते इसे
स्वतंत्र , पर
पर इसकी साँसे
घोंट दी गई
स्वप्न आने से पहले
टूट गए
या यूँ कहे कि
तोड़ दिए गए,
प्रश्न इसका नहीं कि
यह स्वप्न
नवयौवन देह का है
या उसके प्रेम का
दर्द तो तब उठता है
जब कोई स्वप्न देखता  है
मंतव्य, तो उस स्वप्न का है
जो नवयौवन का है
जिसकी परिधि केवल 
प्रेम या देह होती
न कि गीता के वे पद
जो कहते है
आत्मा अमर है
प्रेम अमर है
तो ऐसा क्यों ,
कि
प्रेम या देह
जो नवयौवन का स्वप्न है
अमर नहीं ?
आखिर क्यों ?
प्रश्न और केवल ?
 
   

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कविता :- साम्य शब्द


सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द है
जो न दिखते है, और
न नज़र आते है
वैज्ञानिक भाषा में
ये वर्चुअल है/
सत्ता, विकास के साथ कायम है  
तो सत्तावादी, वायदों के साथ
और  इनके मध्य पिसते हैं
जन और नागरिक होने के
दुरूह प्रश्न ........
जो हमारी संसद को मानती है
राष्ट्र का स्तम्भ  /
जहाँ विकास के रूप में
फसाएं जाते है चुनावी पेंच
और कह दिया जाता है कि,
भारत विभिन्नताओं का देश है
जहाँ दो कदम पे भाषा
तो चार कदम पे इंसान
जाते है बदल ..../
परन्तु सत्तावादियों ने इसे
जोड़ दिया विकास से,
जिससे आज दो कदम पे
भाषाई राज्य
तो चार कदम पे पैदा हो जाते है
जातीय समीकरण ////
जिसके साथ नापी जाती है
सत्ता और वायदों की मजबूती            
यू. एन . में देखना शुरू  हो जाता है
देश को स्थाई रूप में,पर
सत्तावादियों ने विकास को
देखा है नए चश्मे से
जो तेलंगाना , माओवाद,
आफ्सा, दार्जिलिंग
बोफ़ोर्स से स्पेक्ट्रम के घोटाले
या भोपाल से गोधरा की परिधि
में आता है नज़र साफ़-साफ़
6 बाई 6 की आई साईट पे,
जिसमे संसद व नरीमन पॉइंट
दिखता है आत्मरक्षा की मिसाल के रूप में //,
सत्ता यहाँ उदर में भूख की आग, तो 
विकास में सुरक्षा लेकर चलती है, पर
सत्तावादियों को न ही दिखाई पड़ता है
किसानो के चर्चराए खेत  और
न ही  कालाहांडी, आंध्र  ,
महाराष्ट्र के प्यासे किसानो की फसी हुई हुंडी ///
हाल यह भी सुना है कि संविधान
जो हमारे देश में स्थापित
करता है सत्ता ,
सुनाता है उद्घोषणा कि
सत्तावादियों के हितों को
नहीं किया जा सकता संक्षिप्त
किसी भी स्थिति में....क्योंकि
सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द हैं ///////                 

शुक्रवार, 29 जून 2012

निकाय चुनाव 2012

शहर में लोगो की भीड़ है यारो
और ग़ालिब भी कहते है
सलीके के लोग है यारो
कोई हसिया दिखता है
कोई कमल दिखता है
एक महाशय से मिला तो
कोई दिल दिखता है
कोई दरबा दिखता है
चौक से गुज़रा तो
कोई दस दिखता है
कोई सौ दिखता है 
आज ही खबरनवीसो से जाना
नशेमंदी न होगी अब ,पर
कोई वोदका दिखता है
कोई विस्की दिखता है
कल चाय पर कुछ पंडितो से जाना
हमारा शहर भी हाई-टेक हो जायेगा पर ,
कोई दाहिना दिखता है
कोई बांया दिखता है..
अब तो यह सूरत-ए-हाल निकला कि
बाटेंगे तुम्हे अब, पर
कोई हिन्दू दिखता है
कोई मुस्लिम दिखता है
शहर में लोगो की भीड़ है यारो
और ग़ालिब भी कहते है
सलीके के लोग है यारो

बुधवार, 13 जून 2012

हरा + लाल = काला



भिन-भिन-भिन-भिन 
भिन-भिन-भिन-भिन........
इक संगीत ////
गूंज रहा था अचेतन में 
इक अजीब सी दुर्गन्ध 
रही थी फ़ैल 
दूर से दिख पड़ा कुछ
लाल और काले कपडे का चिथड़ा 
सुबह भी पहला रंग 
यही देखा था मैंने, पर 
उसे सुबह देखा था अकेले 
और अभी देख  रहा हू 
कईयों के बीच में 
बाढ़ में घर था डूबा 
तो लाल टिके के चक्कर में 
आया था गुलाबी शहर
जीना सीख ही रहा था 
रोज़ तिपहियो के चक्कों 
सा घिस कर 
कमाता भी ठीक था, पर 
इतना घिसता था कि
उस चिथड़े कि तरह
हरा बचाता लाल बचाता 
और बनता लाल को 
हरा और हरे को .........
और इसी हरे-लाल
मिलावट के दौर में 
काली थी ली पी, और 
कै पे कै भी हुई
उडी भी दुर्गंधिया 
फिर भी लाल-हरा का अंतर 
पहचान न पाया, शायद 
उसको रंगों कि जात 
थी नहीं सुझाती 
इसीलिए तो आज कुछ 
खाकी वर्दी और पंचनामे का कागज 
साथ में बहुत सारी दुर्गंधिया    
और भिन-भिन-भिन.....
भिन-भिन-भिन.......
का संगीत////
जो कह रहे थे कि कल
रात थी पी ली 
शराब ज़हरीली 
जो उसके हरे-लाल को 
मिला दिया और
बना दिया एक रंग 
काला ..............
,,,,,,,,,,,,,,,,,पक्का ///////

निर्णय


इस ग्रह की थी 
कुछ मर्यादाएं 
कुछ जीवित थी 
कुछ सड़ी-गली
कुछ स्वयं चली 
कुछ लादी गई 
इनका वहन
मुझे भी करना, पर
आगे निर्णय मेरा होगा 
किसे है लेकर चलना 
किसे दफन कर देना है
जिससे मेरी संतति को 
मेरा कुछ उपभोग मिले ///// 

मंगलवार, 29 मई 2012

माँ की डेहरी की याद

कभी घर की डेहरियों से
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///  

तरन्नुम चार

१-; शोख हवाओं के परिंदों से
      कुछ कहना हम भूल गए
      वादी के इस नए मौसम से
      हम उड़ना 
भी आज भूल गए ///
****************************

२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
     फिर भी नामो- निशा तेरा 
दिखता नहीं कहीं 
     रोज़-रोज़ चलता हूँ तेरे रूखे साथ में 
     फिर भी तेरी पैमाइश होती नहीं कहीं ..////
*******************************

३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
      परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना
ढूंढ़ते है
      पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
      फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
*******************************

४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
     फिर भी नए दाग लगते रहे
     ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
     मौत से भी इसकी दावा न बनी
     लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
     अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
     दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे 
     ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
     कब्र की तहों से भी 
हारने लगे ////

राही

पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की
सोच समुन्दर सा गहरा था
कर्म की रेख नापती इसको
लगता कितनी दूर चलू मैं
सोच की गहरे ढूंढ़ चलू मैं
उस कर्म रेख की गहरी स्याही
अपने जीवन पर छोड़  चलू मैं /
पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की ....
  

रविवार, 20 मई 2012

आकर्षण Vs प्रेम


उस आकर्षण के पीछे
कितने पल का
मौन छिपा था
शायद
उसके मन:स्थल से
यही प्रश्न उभरता था /
क्यों छन भर में
वह उच्च पटल से
निम्न सतह पर होता ?
उच्चावच का यह रेखांकन
मस्तिष्क ह्रदय
संपर्क रेखा सी
अन्तःस्थल से मुक्त गगन का
स्पर्श गान सा
था लगता ;
उसके प्रति था
यह आकर्षण
या इसे
प्रेम का गान कहू ?

आपाधापी एवम प्रेम

आँखों में तस्सुउवर
पलकों में शिकायत
उनको क्या पता ?
हमको क्या जरुरत
दो पल - दो शब्दों
से
क्या होता ?
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
साथ की
एहसास की ज़रूरत
वह ख़ुशी
कुछ पाने की
वो गम
कुछ खोने का
एक पल में
सब लुटा देने का,
और
हमेशा के लिए
लुट जाने को
कुछ भी
न पास रखने को;
और
सबकुछ पा लेने की चाहत
ये सब
मैंने भी चाहा ,
पर क्या
इस जग में
मुमकिन है?
ये सुकून
प्यार ,
एहसास ,
सब बेगाने लगते है
आज की इस
भौतिकता में ,
पता नहीं
मस्तिष्क की छड्भंगुरता
ह्रदय की अरक्तता
ये सब
कब तक ?

शुक्रवार, 18 मई 2012

पहचान का प्रश्न



तू सब्र है मेरा
तू इम्तहा है मेरा
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा ////
तू दर्द भी है
तू दवा भी है
तू लहर भी है
तू है साहिल भी
तू कशमोकश है रातों की
तू निंदिया भी है राहतों की .
कैसी है ये बेखुदी तेरी
न चाहे भी तू धडकता है
ऐ मेरे नादा दिल
क्यों तू रह-रह के बरसता है ///
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा
तू सब्र है मेरा...या...तू है इम्तहा मेरा///
♥ ♥ ♥

जीवन और आकाल


कभी दिल ये दरिया था
आज न तो दरिया है और
न ही पानी ........
न ही गहराई ....
रह गया है तो मात्र
एक छिछला सा तलहट
जिसमे न जीवन है
और न अतीत के निशान...////

मैं और तुम



सपहा सपहा जीवन से मिट
जाती है संवेदनाये, क्यों
क्यों धरातल इतना कठोर
हो जाता कि ,अगर
गिर जाये कोई तो
टूट जाता है, या
कह सकते है बिखर जाता है
संवेदनाये इतनी कमज़ोर तो
नहीं होती ...परन्तु
समय सम्बद्ध परिभाषाये
और स्वरुप बदल जातें है
जैसे मै और तुम बदल गए /

ईशा और मैं



ईशा को भी मिला था
सलीब पे कुर्बा होने का
सिला .....
मैंने भी होना चाहा कुर्बा
पर न अब वो सलीब ही रहा
और न वो खुदा ...
ऐसा नहीं कि मैं कभी
खुदा होना चाहा
पर होना चाहा उन लोगो का
जिनका खुदा होता है ...
पर न वो लोग मिले
और न मैं कुर्बा हुआ ...
धत तेरी कि .....

मोहभंग


अब नहीं मैं लौट पाऊंगा कभी
क्योकि तेरी याद में
अब प्यार सा लगता नहीं
लगता है वह केवल
सपनो का खँडहर और
उनकी कुछ टूटती दीवार जर्जर
जिस पर कभी रौशनी
और अलसाई हुई कुछ दूब होती थी ///

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए मिलकर बैठे
साथ तेरे 
बहुत दिन हुए पकड़कर बैठे 
हाथ तेरे 
बहुत दिन हुए सुलझाये तेरे उलझे 
बाल तेरे 
बहुत दिन हुए आँखों में 
डूबे तेरे 
बहुत दिन हुए देखे दिन में 
ख्वाब तेरे 
बहुत दिन ......मगर तुम कहती हो
कि अभी कल की ही तो बात है ..
पर बहुत दिन हुए//////// 

बानगी

गिर गए है शाख से पत्ते बहुत
ज़िन्दगी के ......
शायद आज फिर से तूफ़ान आया है
कही पे ........
बच गए है कुछ निशां अब
ज़िन्दगी के .....
शायद बानगी है नए पत्तो की
यहाँ पे ...

रकबा


हर रकबा था मेरा न जो 
चाह बहुत बनाना अपना 
धीरे-धीरे बना चौहद्दी 
और बनाई मेड़े भी  
सींच-सींच कर, बो कर
ख्वाबो के कुछ बीज भूरे-भूरे

रातों की नीदों को उसके आँचल  
में रखकर ,
खुली हवाओ की थपकियों से 

किया जिसे था हरा-भरा 
जैसे माँ अपने बच्चो को
पला करती 
अपने ख्वाबो की डाली पे बैठा कर
और वही डाली एक दिन जैसे
तेज़ हवाओ में तोड़ 
सारे ख्वाबो को
खुद ही पला करता है 

कुछ रकबो का ख्वाब    

मेरा रकबा वैसे ही
जो न था मेरा
ले जाता है आसामी 
मंडी और बाजारों में, और
मोला-तोला है भावो में
चाहा बहुत जिसे बनाना अपना
धीरे-धीरे बना चौहद्दी
हर रकबा था मेरा जो न //////


विकल्प

उन नाखुनो की खुरचन से 
बचना चाहा है मैंने
जिनके पंजो में
आ जकड़ा, शायद
यह विकल्प ज्यादा 
अच्छा था , क्योकि
जकड़ा जाना कम
दुष्कर है, वानस्पत
खुरचे जाने के ///////