तुम्हारी चुप्पी में मौन नहीं
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///
मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए
दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////
मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///
तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///
क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///
मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए
दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////
मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///
तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///
क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////